गांधी की आख़िरी ईद

शाहनवाज़ आलम
जिस दिन भारत को आज़ादी मिली उस दिन महात्मा गांधी कलकत्ता में थे. तब बंगाल सांप्रदायिक उन्माद और हिंसा में जल रहा था. इसलिए उस दौरे का एकमात्र मकसद हिंदुओं और मुसलमानों में एक दूसरे के प्रति भरोसा पैदा करना था. उस समय रमज़ान का महीना चल रहा था. गांधी जी सांप्रदायिक हिंसा प्रभावित जगहों पर पीड़ित पक्ष के मुहल्लों और घरों में रहने के अपने नियम के तहत ‘हैदरी मंज़िल’ में रह रहे थे. नोवाखाली में जहाँ मुसलमानों ने अल्पसंख्यक हिंदुओं के ख़िलाफ़ हिंसा की थी, गांधी पीड़ित हिंदू परिवारों के घरों में रहते थे.
गांधी जी के अंतिम डेढ़ दो-वर्षों के जीवन, जिसका एक मात्र मकसद सांप्रदायिक सौहार्द क़ायम करना था, पर लेखक पुष्यमित्र की ‘गांधी का सैंतालीस’ एक महत्वपूर्ण किताब है. पुस्तक के हवाले से गांधी जी के जीवन के आख़िरी ईद के इर्दगिर्द की घटनाओं को समझना बेहद ज़रूरी है. क्योंकि बहुत हद तक स्थितियां वैसी ही हैं या इस वजह से बद्दतर हैं कि अब कोई ‘गांधी’ नहीं है जो हिंसा रोकने के लिए सीधे लोगों के बीच चला जाए.
15 अगस्त के बाद के पूरे पखवाड़े गांधी जी ने कलकत्ता के अलग-अलग इलाक़ों में सर्वधर्म प्रार्थना सभाएं कीं. जिसमें एक सभा में तो सात लाख लोग आए. गांधी के प्रार्थना सभाओं का असर इन आँकड़ों से समझा जा सकता है कि जब 15 अगस्त को 30 हज़ार लोग जुटे तो ऐसा लगा कि यह भीड़ ख़ास मौक़े पर आई है. लेकिन अगले दिन 16 अगस्त को 50 हज़ार लोग आए और 17 अगस्त को 1 लाख लोग आए. जो आगे चल कर 7 लाख तक पहुंच गया.
17 अगस्त को डायरेक्ट एक्शन डे की हिंसा के सूत्रधार और अब एक बदले हुए व्यक्ति लग रहे सोहरवर्दी ने प्रार्थना सभा को सूचित किया कि- “कल या परसो जब भी इस बार ईद का आयोजन होगा, इसके लिए शहर के मुसलमानों ने अपने हिंदू भाइयों को भी आमंत्रित किया है”. गांधी जी को भी कहीं से ख़बर मिली थी कि कई हिंदू चाहते थे कि वे रोज़ा खोलने के लिए मस्जिदों में अपनी तरफ़ से खाना भेजें. ऐसी ख़बरें सुनकर सभी ख़ुश हो गए. (पेज 211).
ईद के दिन कलकत्ते के मुसलमान बड़ी संख्या में फल और मिठाइयाँ लेकर हैदरी मंज़िल पहुंच रहे थे. उस रोज़ गांधी जी का साप्ताहिक मौन था, इसलिए उन्होंने बधाई का एक छोटा सा संदेश लिख रखा था. जो फल आते, उन्हें लोगों में बँटवा दिया जाता.
तभी कलकत्ते से 22 किलोमीटर दूर बैरकपुर में जुलूस निकालने के मसले पर उपद्रव की बुरी ख़बर आई. गांधी के वहाँ पहुंचने से पहले लोगों ने ख़ुद ही झगड़ा निपटा लिया था. गांधी के पहुंचने पर वहाँ हिंदुओं और मुसलमानों ने गांधी का जय घोष किया. मुसलमानों ने अपनी ग़लतियाँ मानीं और हिंदुओं ने कहा कि अब वो आगे से मस्जिद के सामने बाजा बजाना बंद कर देंगे. (पेज 211).
इसपर गांधी जी ने एक पुर्जे पर लिखा- “मुझे आशा है कि नमाज़ के वक़्त मस्जिदों के पास बाजा न बजाने का यह फ़ैसला सभी को स्वीकार्य है. और यह सभी हिंदुओं पर लागू होगा. लीग और कांग्रेस ने सारे मतभेद शांतिपूर्ण उपायों से और बल प्रयोग के बिना दूर करने की बात स्वीकार की है.”
उस रोज़ शाम की प्रार्थना सभा मोहम्मडन स्पोर्टिंग क्लब के मैदान में थी. 5 लाख लोग जमा थे. ईद की बधाई देने जब गांधी जी खड़े हुए तो लोगों ने देर तक तालियाँ बजाईं.
ईद के ही दिन कलकत्ता से 42 किलोमीटर दूर कांचरपाड़ा औद्योगिक क्षेत्र में हिंसा होने की ख़बर आने के बाद गांधी जी सुबह वहाँ पहुँचें. वहाँ मस्जिद के सामने बाजा बजाने को लेकर विवाद हुआ था. जिसमें पुलिस फ़ायरिंग में कई लोग मारे गए थे. गांधी ने वहाँ कहा- “जब तक कांग्रेस और लीग या भारत और पाकिस्तान के बीच इस मसले को लेकर कोई नया समझौता न हो जाए, तब तक बाजा बजाने को लेकर अंग्रेज सरकार के ज़माने की रीत का ही पालन होना चाहिए”. (पेज 212).



