कोर्ट अनुच्छेद 32 और 226 का इस्तेमाल करना किस दबाव में बंद कर चुके हैं- शाहनवाज़ आलम

बरेली में नमाज़ पढ़ने वालों की गिरफ़्तारी पर कोर्ट का स्वतः संज्ञान न लेना आश्चर्यजनक है- शाहनवाज़ आलम

लखनऊ, 19 जनवरी 2026. कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव शाहनवाज़ आलम ने बरेली के एक घर में नमाज़ पढ़ने पर लोगों को गिरफ़्तार किए जाने को पुलिस में बढ़ती संस्थागत सांप्रदायिकता का उदाहरण बताया है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट का इस मामले पर स्वतः संज्ञान न लेने पर भी आश्चर्य जताया है.

शाहनवाज़ आलम ने जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि संविधान का अनुच्छेद 32 और 226 क्रमशः सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामलों पर स्वतः संज्ञान लेकर कार्यवायी करने का अधिकार देता है. लेकिन यह आश्चर्य और अफ़सोस की बात है कि कुत्तों की समस्याओं पर हमारी न्यायपालिका चिंतित होकर ख़बरों के आधार पर स्वतः संज्ञान ले लेती है लेकिन अल्पसंख्यकों को संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों के पुलिस द्वारा उल्लंघन की ख़बरों पर वो संज्ञान नहीं लेती. उन्होंने कहा कि कोर्ट के इस रवैये से सांप्रदायिक अपराधियों और पुलिस तंत्र के अंदर मौजूद सांप्रदायिक तत्वों के मुसलमानों और ईसाइयों का उत्पीड़न करने की छूट मिल जाती है. जैसा कि बरेली और उससे पहले प्रदेश भर में क्रिसमस के दौरान देखने को मिला है.

शाहनवाज़ आलम ने कहा कि यह संयोग से ज़्यादा प्रयोग लगता है कि सीजेआई सूर्यकांत उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की न्यायिक व्यवस्था की सार्वजनिक तारीफ़ करते हैं और प्रदेश की न्यायपालिका राज्य द्वारा अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के मुद्दे पर संज्ञान तक नहीं लेती. उन्होंने कहा कि अगर न्यायपालिका ठीक से अपनी ज़िम्मेदारी निभाती तो बरेली जैसी घटनाएं नहीं होतीं. उन्होंने नमाज़ पढ़ने पर लोगों को गिरफ़्तार करने वाले पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्यवायी की माँग की है.



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